स्वाभिमान की रक्षा | Protect Self-respect

स्वाभिमान की रक्षा | Protect Self-respectपिकलू चंद

आत्मनिर्णय

जब स्वाभिमान को ठेश पॅहुचता हैं तो यह मानना ​​पड़ता है कि जीवन में निर्णय लेने का यही सही समय है। यह एक सिद्ध तथ्य है कि लोग तभी विरोध करते हैं जब उनके पास विरोध करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता है। अन्यथा, लोग सभी परिस्थितियों के अनुकूल अपने आपको प्रस्तुत कर लेते हैं। कुछ स्वतःस्फूर्त विशेषताएं हमारे भीतर जन्म से ही होते हैं और हम चाहें तो उन्हें अस्वीकार नहीं कर सकते। यह प्रकृति का सामान्य नियम है। लेकिन उसे अपने व्यक्तिगत फैसले तथा स्वाभिमान का बचाव करना चाहिए। (स्वाभिमान की रक्षा | Protect Self-respect)

प्रकृति के कोई भी प्राणी चाहे वह वादी या प्रतिवादी क्यों न हो उसे सत्य पर बहस करने का अधिकार जरूर होना चाहिए। उदाहरण के तौर पर मैं कह सकता हूं कि जब घर में झगड़ा होता है तो उसकी कोई खास वजह नहीं होती। यह तो सिर्फ सम्मान और प्रेम का बिषय है।

यदि आप किसी का अनुसरण करते हैं, तो आप देखेंगे कि आपके हृदय में पर्याप्त सम्मान है उस व्यक्ति के लिए ।

फिर से, यदि आप बिना किसी स्वार्थ के किसी से प्यार करते हैं, तो आप उनके अच्छे कर्मों, बुरे कर्मों, दोषों और उनके दोषों को भी सुंदर रूप में देख सकते हैं। क्योंकि आप उनसे प्यार करते हो। प्यार या सम्मान की कमी होने पर कुछ भी असंभव नहीं है।

कभी-कभी आपको इस बिषय पर समीक्षा करना चाहिएं और अपने लिए सुगम एवं सुन्दर मार्ग प्रसस्थ करना चाहिएं। लेकिन इस बात का एहसास लोगों में एक बार भी नहीं जागती, इसलिए इतनी परेशानी होती है।

व्यावहारिक उदाहरण

जब हम अपनी समस्या लेकर डॉक्टर के पास जाते हैं तो डॉक्टर हमसे पूछते हैं कि समस्या क्या है? हम डॉक्टर को विवरण बताते हैं। फिर भी डॉक्टर हमारी दवा नहीं लिखते। आपकी समस्या को वास्तव में समझने के लिए, डॉक्टर आपको परीक्षण के लिए एक प्रयोगशाला में भेज सकता है या आपको किसी अन्य डॉक्टर के पास भेज सकता है। यह एक बहुत ही प्राथमिक और सामान्य नियम है।

लेकिन असल जिंदगी में हम इस चीज पर ज्यादा रिसर्च नहीं करते हैं। हम अपनी समस्या का समाधान नहीं करना चाहते हैं या इसे गंभीरता से नहीं लेना चाहते हैं। हमें समझ नहीं आता कि हमारी समस्या क्या है और समाधान कहां है? हजारों प्रश्न हो सकते हैं, लेकिन हम उन्हें हल  करने की प्रयास नहीं करते हैं । जब तक हम अपनी समस्या और अपनी जरूरतों के सटीक स्रोत का एहसास नहीं करते हैं और आत्म-मूल्यांकन नहीं करते हैं। तबतक हम उसी उलझन में फशे होते हैं।

एक और चीज जो मैंने जीवन में महसूस की है, वह है दूसरों पर ज्यादा भरोसा नहीं करना चाहिए। जैसे दूध में अधिक पानी डालने से वह दूध नहीं रहता है। इसी तरह जीवन और हर बिषय के मामले में कुछ दूरी रखनी पड़ती है। अन्यथा जीवन बिषमय हो जाएगा और जिसका कोई उत्तर नहीं हैं।

जीवन को जीने के लिए कुछ अंतरंग क्षणों और समान रूप से अनन्य और तथा परित्यक्त क्षणों की आवश्यकता होती है। इसे जीवन में बैलेंस करने वालों को किसी भी तरह की परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता है। लेकिन जब हम दोनों के बीच के अंतर को लीन करते हैं, तो समस्या शुरू हो जाती है। कुछ समस्याएं हल हो जाती हैं, और कुछ समस्याएं कभी हल नहीं होती हैं। कुछ हद तक कैंसर जैसे रोग।

पिकलू चंद

स्वाभिमान की रक्षा | Protect Self-respect

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